
ये कहाँ आ गए हम यूँ हि साथ साथ चलते ? जसवंत सिह को कुछ ऐसा ही लग रहा होगा .गुजरात में उनकी किताब
पर बैन लगाया गया है । बैन लगाने वाले वही लोग है जो कभी अपने ही थे. इस बैन पर मै आपको वेताल की ही तरह एक कहानी सुनाता हूँ .सत्त्रहवी शताब्दी में फ्रांस में दो महान विचारक थे जिनके विचारों का फ़्रांसीसी क्रांति पर विशेष प्रभाव पड़ा । रूसो और वाल्तेयर । दोनों में कभी नही बनी । दोनों एक दूसरे के कटु आलोचक रहे । पर जब रूसो पर प्रतिबन्ध लगाया गया तो वाल्तेयर पहला व्यक्ति था जिसने रूसो पर बैन का जबरदस्त विरोध किया। उसका विचार था की आप रूसो से असहमत हो सकते है , आप उसके विचारों का विरोध कर सकते है ,पर आप उसकी जबान नही बंद कर सकते। विचारों पर प्रतिबन्ध नही लगाया जा सकता...............................अब वेताल की ही तरह मेरा आपसे प्रश्न है की वाल्तेयर ने अपने विरोधी की स्वतंत्रता के लिए लडाई क्यों लड़ी ? और क्या हम अभी भी अपनी सोच में सतरहवी शताब्दी से भी पीछे है? बी जे पी सोच रही है .... चलो अच्छा हुआ अपनों में कोई गैर तो निकला । और जसवंत सिह सोच रहे है, " की अपने ही गिराते है नशेमन पर बिजलियाँ ". और आप क्या सोचते है?