Tuesday, February 2, 2010

कहां हैं नाज़ी



तब एक कविता पढी थी.....................
पहले नाज़ी आये कम्युनिस्टों के लिये,
फ़िर यहूदियों के लिये,
फ़िर ट्रेड यूनियनों के लिये,
फ़िर कैथोलिकों के लिये,
फ़िर प्रोटेस्टेन्टो लिये...........
पर अब नाज़ी नही है .
वो घुस गये हैं हर किसी में,
कम्युनिस्टों में,ईसाइयों में, हिन्दुओं में,
मुस्लिमों में और यहूदियों मे.
और खा रहें हैं सब के अन्दर की..,
इन्सानियत, दोस्ती और प्यार,
पर सबके चेहरे पर चस्पा है एक इश्तहार,
जिसमें चमक रहा है...
"हम एक है " का विचार.

Tuesday, December 29, 2009

मुर्दों से खेलते हो बार-बार किस लिए,



पिछले दिनों ब्लॉग पर धर्म को लेकर बड़ा विवाद रहा .कुछ लोगों ने एक दूसरे के धर्म को नीचा दिखाने की पुरजोर कोशिश की.जिसका कोइ औचित्य नहीं था .सच्चाई तो ये है की आज के वैज्ञानिक और तार्किक युग में कोइ भी धर्म अपने मूल रूप में सत्य साबित नहीं हो सकता.कोइ भी धर्म उतना ही सत्य है जितना की दूसरा.और कोइ भी धर्म उतना ही असत्य है जितना की दूसरा। हलांकि हम इससे भी इनकार नहीं कर सकते की मानवता के इतिहास में धर्मो ने भी अपनी एक विशिष्ट भूमिका निभाई है। सभी ने अपने अपने हलकों में एक बहुत बड़े वर्ग को एक जैसा सोचने और समझने की समझ दी है.पर ये भी सत्य है की धर्मों की एतिहासिक भूमिका के अनेक पृष्ठ मानवता के रक्त से रंजित है.मानवता की मुक्ति का आश्वासन देने वाले सभी धर्म आज मानवता की बेड़िया बने हुए हैं। हजारों साल पहले जो बाते सोची गईं थी । उनपर संशय करना आज स्वाभाविक ही है। जो भी हो .एक बात तो साफ है की अगर ईश्वर है और मानवता को उसकी आवश्यकता भी है तो उससे जुड़ने के लिए किसी माध्यम , किसी धर्म , किसी प्रणाली की आवश्यकता नहीं है.क्यों की अगर इन माध्यमों की जरूरत इश्वर को है तो फिर वो इश्वर कैसा है? और अगर मानवता को है तो भी इल्जाम खुदा पर ही जाता है।

तो फिर मेरी दोस्तों से गुजारिश है की भविष्य की तरफ देखें अतीत की तरफ नहीं, आखिर

मुर्दों से खेलते हो बार-बार किस लिए,
करते नहीं हो खुद पे एतबार किस लिए .






Friday, October 23, 2009

रोज


रोज एक दुनिया लेती है जन्म
और रोज मर जाती है एक दुनिया।
रोज एक हौसला होता है बलंद,
और रोज ही पस्त होता है एक हौसला।
रोज उगती है एक उम्मीद,
और एक उम्मीद रोज दम भी तोड़तीहै।
रोज परवान चढ़ता है एक प्यार का बुखार,
और रोज उतर जाता है एक खुमार प्यार का।
तो ! कौन कहता है कि आयेगी एक दिन कयामत?
कयामत तो होती है रोज, क्यों कि -
रोज ही मरता है एक आदमी,
रोज उजड़ जाती है दुनिया किसी की,
किसी का हौसला,किसी कि उम्मीद, किसी का प्यार।
कोई नही आता है काम,
न कोई रहबर , न मसीहा, न सरकार।
फिर भी....
एक आदमी होता है फिर पैदा,
और जग जाती है,
एक उम्मीद, एक हौसला,एक प्यार।

Thursday, October 15, 2009

मै ही तुम्हारे प्यार के काबिल नही !

कल ही एक ग़जल कही जो आप सब की नजर है।

...........
उसकी बातों मे कहीं कुछ इल्म का गुमान है.,
ये कोई बाजीगरी है सबको ये इमकान है.!
वो किसी से पूछ कर चलता नहीं था रास्ते.,
फ़िर कहां से पाई मंजिल हर कोई हैरान है!
अब के बारिश में बरसती आ रही है उसकी याद.,
सर पे कोई छ्त पडी है इस बात से अनजान है!
मै ही तुम्हारे प्यार के काबिल नही था दोस्तों।,
इतनी ही सच्चाई है बस बाकी सभी इल्जाम है!
अब अमीरी का खयाल आता नही है क्या करें।.
खल्क की ख्वाइश सभी है औ साथ में ईमान है!
अब के जब भी वो मिलेगा मै लगाउंगा गले ।.
ये कोई ख्वाइश नहीं है बस जरा एहसान है !

Friday, August 28, 2009

अपने ही गिराते है नशेमन पर बिजलियाँ !



ये कहाँ आ गए हम यूँ हि साथ साथ चलते ? जसवंत सिह को कुछ ऐसा ही लग रहा होगा .गुजरात में उनकी किताब
पर बैन लगाया गया है । बैन लगाने वाले वही लोग है जो कभी अपने ही थे. इस बैन पर मै आपको वेताल की ही तरह एक कहानी सुनाता हूँ .सत्त्रहवी शताब्दी में फ्रांस में दो महान विचारक थे जिनके विचारों का फ़्रांसीसी क्रांति पर विशेष प्रभाव पड़ा । रूसो और वाल्तेयर । दोनों में कभी नही बनी । दोनों एक दूसरे के कटु आलोचक रहे । पर जब रूसो पर प्रतिबन्ध लगाया गया तो वाल्तेयर पहला व्यक्ति था जिसने रूसो पर बैन का जबरदस्त विरोध किया। उसका विचार था की आप रूसो से असहमत हो सकते है , आप उसके विचारों का विरोध कर सकते है ,पर आप उसकी जबान नही बंद कर सकते। विचारों पर प्रतिबन्ध नही लगाया जा सकता...............................अब वेताल की ही तरह मेरा आपसे प्रश्न है की वाल्तेयर ने अपने विरोधी की स्वतंत्रता के लिए लडाई क्यों लड़ी ? और क्या हम अभी भी अपनी सोच में सतरहवी शताब्दी से भी पीछे है? बी जे पी सोच रही है .... चलो अच्छा हुआ अपनों में कोई गैर तो निकला । और जसवंत सिह सोच रहे है, " की अपने ही गिराते है नशेमन पर बिजलियाँ ". और आप क्या सोचते है?

Tuesday, July 28, 2009

हंगामा है क्यौं बरपा ?



तो फ़िर एक हंगामा हो गया. ऐसे समाज मे जहां लोग गीता, बाइबिल और कुरान पर हाथ रख कर झूठ बोलते है, वहीं कुछ ऐसे भी है जो शायद पैसे, शोहरत या खेल के लिये सच बोलने को तैयार हैं ".सत्यमेव जयते" जिस देश का मूल मन्त्र है, और जिस संस्कृति मे सिखाया जाता है सत्यम वद धर्मम चर , वहीं कुछ लोग इसे भारतिय संस्कृति का विरोधी बता रहें है." सच का सामना" से केवल उन लोगों का ही सच सामने नही आया है जो इस खेल मे हिस्सा ले रहे है, हमारे समाज का भी सच सामने आया है कि उसे परछिद्रान्वेषण मे कितनी रुचि है.उसे दूसरो की कमियां देख्नने मे कितना मजा आता है.शो की T R P जबरद्स्त है .हमारी मानसिकता भी विरोधाभासों से भरी पडी है.आपकी कमी कोई दूसरा बताये तो ठीक, जैसा की खोजी पत्रकार लोग करते है. पर आप खुद ऐसा नही कर सकते . और वो भी पैसे या किसी खेल के लिये तो कत्तई नहीं . आप चाहें तो फ़ादर के सामने कन्फ़ेशन कर सकते है , क्योंकि इससे जन्नत मिलने की गुन्जाइश है, पर आप खेल के लिये ऐसा कैसे कर सकते हैं ?जहां तक भारतीय संस्कृति का सवाल है, भारतीय संस्कृति किसी एक किताब या किसी एक व्यक्तित्व पर आधारित नही है. उसके अनेक आयाम है,और सत्य उसकी मूल अभिव्यक्ति हैं .

एक सवाल और भी खडा होता है कि क्या हम उन लोगों से घृणा करने लगे है जिन्होने सच का सामना किया है? मेरा खयाल है कि ऐसा नही है. सच बोलने वालों के प्रति लोग सहानुभूति ही रखते है. और अगर ऐसा है तो क्या हम एक सभ्य समाज के रूप मे विकसित नही हो रहें है ? एक सवाल ये भी है कि क्या हमारी संस्कृति इतनी कमजोर है कि कुछ लोगों के सच बोलने से बिख्रर जायेगी.? क्या हम बौने सचों का सामना करने से भी डरने लगे है? क्या एक खेल का सच ही हमारे वजूद का सच है ?
ये आशंका भी जताई जा रही है कि इससे परिवार टूट्ने की गुन्जाइश है .पर वास्तविकता तो ये है कि ये शो तो अब आया है पर तलाक की लाखों अर्जियां आज भी पहले से ही पेन्डिंग है. इससे तो यही पता चलता है की परिवार टूटने की वजह स्त्री और पुरुष है न कि सत्य. सच्चाई कड़वी होती और तब और भी कड़वी हो जाती है जब उसमे हमारा भी सच कहीं झांकता है. जो हो, ये एक खेल है ,इसे खेल ही रहने दें,खेल से बड़ा न् बनाये.

Monday, July 20, 2009

ये जो है आदमी



दोस्त्तों बारहां एक सवाल आपको भी तंग करता है और मुझे भी ,और जब हम उसकी तलाश में दूर तक जाते हैं तो हमें पता चलता है कि सवाल तो वहीं खड़ा है, अनुत्तरित सवालों से उलझती हुई कविता आपकी नज़र है.

आदमी आखिर है क्या ?
एक बेवजह मुश्तगुबार, या
असंगत चाहतों का अम्बार.
चुकी अनचुकी बातों की कहानी, बेवक्त आयी गई उम्र की रवानी.
होने, न होने के द्वन्द की माया
उम्मीदों के ज्वार में जलती-बुझती काया
वजूद के साये से भीख मांगती याचना, या
दर्द के जंगल में भटकती निरथक वासना.
अमृत है, विष है, पाप है, वरदान है,
जीव है, ब्रह्म है, बंदा है,अभिषप्त है, अनजान है.

पर,
इन परिभाषाओ से परे यह प्रश्न आज भी खड़ा है.
की क्या आदमी होने का दम्भ , आदमी होने की वासना से बड़ा है ?.