Tuesday, December 29, 2009

मुर्दों से खेलते हो बार-बार किस लिए,



पिछले दिनों ब्लॉग पर धर्म को लेकर बड़ा विवाद रहा .कुछ लोगों ने एक दूसरे के धर्म को नीचा दिखाने की पुरजोर कोशिश की.जिसका कोइ औचित्य नहीं था .सच्चाई तो ये है की आज के वैज्ञानिक और तार्किक युग में कोइ भी धर्म अपने मूल रूप में सत्य साबित नहीं हो सकता.कोइ भी धर्म उतना ही सत्य है जितना की दूसरा.और कोइ भी धर्म उतना ही असत्य है जितना की दूसरा। हलांकि हम इससे भी इनकार नहीं कर सकते की मानवता के इतिहास में धर्मो ने भी अपनी एक विशिष्ट भूमिका निभाई है। सभी ने अपने अपने हलकों में एक बहुत बड़े वर्ग को एक जैसा सोचने और समझने की समझ दी है.पर ये भी सत्य है की धर्मों की एतिहासिक भूमिका के अनेक पृष्ठ मानवता के रक्त से रंजित है.मानवता की मुक्ति का आश्वासन देने वाले सभी धर्म आज मानवता की बेड़िया बने हुए हैं। हजारों साल पहले जो बाते सोची गईं थी । उनपर संशय करना आज स्वाभाविक ही है। जो भी हो .एक बात तो साफ है की अगर ईश्वर है और मानवता को उसकी आवश्यकता भी है तो उससे जुड़ने के लिए किसी माध्यम , किसी धर्म , किसी प्रणाली की आवश्यकता नहीं है.क्यों की अगर इन माध्यमों की जरूरत इश्वर को है तो फिर वो इश्वर कैसा है? और अगर मानवता को है तो भी इल्जाम खुदा पर ही जाता है।

तो फिर मेरी दोस्तों से गुजारिश है की भविष्य की तरफ देखें अतीत की तरफ नहीं, आखिर

मुर्दों से खेलते हो बार-बार किस लिए,
करते नहीं हो खुद पे एतबार किस लिए .






9 comments:

उम्दा सोच said...

आज धर्म के राह को प्रशस्त करने का वास्ता दे कर हर तरफ अधर्म ही अधर्म व्याप्त है ! ऐसा लगता है जैसे फार्मूला हो "अच्छे भले की मति भ्रष्ट करना हो तो आस्था का सहारा लो !"

आप का ये लेख पढ़ जो विचार कर ले तो सौहार्द का वातावरण हर तरफ व्याप्त हो !

अजय कुमार said...

दूसरे धर्म का अनादर करने मात्र से कोई धर्म छोटा या बड़ा नही होता । पर ऐसा करने का प्रयास हुआ ।
आपका लेख सटीक है , शायद छोटी मानसिकता वाले लोगों की सोच बदले ।

महेन्द्र मिश्र said...

बढ़िया आलेख प्रस्तुति . विचारणीय

vimal verma said...

अखिलेशजी,इस मुद्दे पर तो ढेर सारी भ्रांतियाँ हैं...और आप ने बहुत सुलझे अंदाज़ में लिखा है...इस विषय पर और मनन करने की ज़रूरत है ...यही मुद्दा है जिसको आधार बना कर रजनीतिक रोटियाँ सेकी जाती रही हैं....अच्छा लेख पढ़वाने के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

रश्मि प्रभा... said...

मुर्दों से खेलते हो बार-बार किस लिए,
करते नहीं हो खुद पे एतबार किस लिए .
......kamaal ka aalekh hai

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत सुंदर।

Apoorv said...

बहुत जरूरी बात कही है आपने..आज के वक्त के लिये..एकदम सहमत!!!

Udan Tashtari said...

बिल्कुल सही कहा...


यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

नववर्ष में संकल्प लें कि आप नए लोगों को जोड़ेंगे एवं पुरानों को प्रोत्साहित करेंगे - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

आपका साधुवाद!!

नववर्ष की अनेक शुभकामनाएँ!

समीर लाल
उड़न तश्तरी

प्रवीण शाह said...

.
.
.
मुर्दों से खेलते हो बार-बार किस लिए,
करते नहीं हो खुद पे एतबार किस लिए।


सुन्दर आलेख, सहमत हूँ आपसे।