Tuesday, July 28, 2009

हंगामा है क्यौं बरपा ?



तो फ़िर एक हंगामा हो गया. ऐसे समाज मे जहां लोग गीता, बाइबिल और कुरान पर हाथ रख कर झूठ बोलते है, वहीं कुछ ऐसे भी है जो शायद पैसे, शोहरत या खेल के लिये सच बोलने को तैयार हैं ".सत्यमेव जयते" जिस देश का मूल मन्त्र है, और जिस संस्कृति मे सिखाया जाता है सत्यम वद धर्मम चर , वहीं कुछ लोग इसे भारतिय संस्कृति का विरोधी बता रहें है." सच का सामना" से केवल उन लोगों का ही सच सामने नही आया है जो इस खेल मे हिस्सा ले रहे है, हमारे समाज का भी सच सामने आया है कि उसे परछिद्रान्वेषण मे कितनी रुचि है.उसे दूसरो की कमियां देख्नने मे कितना मजा आता है.शो की T R P जबरद्स्त है .हमारी मानसिकता भी विरोधाभासों से भरी पडी है.आपकी कमी कोई दूसरा बताये तो ठीक, जैसा की खोजी पत्रकार लोग करते है. पर आप खुद ऐसा नही कर सकते . और वो भी पैसे या किसी खेल के लिये तो कत्तई नहीं . आप चाहें तो फ़ादर के सामने कन्फ़ेशन कर सकते है , क्योंकि इससे जन्नत मिलने की गुन्जाइश है, पर आप खेल के लिये ऐसा कैसे कर सकते हैं ?जहां तक भारतीय संस्कृति का सवाल है, भारतीय संस्कृति किसी एक किताब या किसी एक व्यक्तित्व पर आधारित नही है. उसके अनेक आयाम है,और सत्य उसकी मूल अभिव्यक्ति हैं .

एक सवाल और भी खडा होता है कि क्या हम उन लोगों से घृणा करने लगे है जिन्होने सच का सामना किया है? मेरा खयाल है कि ऐसा नही है. सच बोलने वालों के प्रति लोग सहानुभूति ही रखते है. और अगर ऐसा है तो क्या हम एक सभ्य समाज के रूप मे विकसित नही हो रहें है ? एक सवाल ये भी है कि क्या हमारी संस्कृति इतनी कमजोर है कि कुछ लोगों के सच बोलने से बिख्रर जायेगी.? क्या हम बौने सचों का सामना करने से भी डरने लगे है? क्या एक खेल का सच ही हमारे वजूद का सच है ?
ये आशंका भी जताई जा रही है कि इससे परिवार टूट्ने की गुन्जाइश है .पर वास्तविकता तो ये है कि ये शो तो अब आया है पर तलाक की लाखों अर्जियां आज भी पहले से ही पेन्डिंग है. इससे तो यही पता चलता है की परिवार टूटने की वजह स्त्री और पुरुष है न कि सत्य. सच्चाई कड़वी होती और तब और भी कड़वी हो जाती है जब उसमे हमारा भी सच कहीं झांकता है. जो हो, ये एक खेल है ,इसे खेल ही रहने दें,खेल से बड़ा न् बनाये.

8 comments:

AlbelaKhatri.com said...

baat ka batangad banaa diya gaya hai bhai..........
aap ki baat sahi hai !

Udan Tashtari said...

परिवार टूटने को बढ़ावा तो देगा ही...इस तरह का काम!

Ratan Singh Shekhawat said...

गलत हो या सही लेकिन ऐसे शो की कोई जरुरत नहीं थी |
इस शो में भाग लेने वाले प्रतियोगियों का परिवार टूट जायेगा ऐसा में नहीं सोचता | ये सब पैसे के लिए यहाँ भाग ले रहे है और वही लोग है जिन्हें अपने जीवन साथी द्वारा ऐसे सच स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं है |

GATHAREE said...

इस शो में कोई बुराई नहीं है , प्रतिभागी लोग भी बहादुर हैं लेकिन इसके कुछ साइड -इफ्फेक्ट हैं १
कोई बच्चा जो अपने माता- पिता को बेस्ट मानता है अचानक ही कोई अप्रत्याशित
बात जानेगा तो उसके दिल पर क्या गुजरेगी ?
ठीक है आप बहुत साहसी माने जायेंगे लेकिन ऐसे साहस और सच्चाई का क्या
जो आपके बच्चे ,आपके अपने लोगों का दिल तोड़ दे,आपको उनकी नज़रोंसे गिरा दे !
वैसे तो आप स्वतंत्र हैं , आपका निजी फैसला भी है लेकिन क्या आप का कोई कर्त्तव्य
भी है ?????इस सच का सामना भी कीजिये !

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

कभी महात्मा गांधी ने आत्मकथा को शीर्षक दिया था, सत्य के साथ मेरे प्रयोग, और उसकी भरपूर सराहना हुई. लेकिन आज जब साधारण लोग अपनी ज़िन्दगी का सच उजागर करने के लिए आगे आ रहे हैं तो हमें तमाम तरह की आशंकाएं सता रही हैं.सच बोलने से उनके घर टूट जायेंगे - मानों घरों की नींव में झूठ का सीमेण्ट भरा हुआ है. इस शो की कोई ज़रूरत नहीं थी, कहने वालों से मैं पूछना चाहूंगा कि यह कैसे तै होगा कि किस चीज़ की ज़रूरत है और किसकी नहीं. शो चल रहा है, लोग देख रहे हैं, यही काफी नहीं है क्या?

उम्दा सोच said...

इस पर भीखु महात्र्रे का डाईलाग याद आता है!"वो सच साला काहे का सच जिससे किसी की जान जाये!"

आप का पक्छ शशक्त है!

Rahul said...

बढ़िया है, बन्धु! आपके विचारों ने बहस को एक नया आयाम, एक फ्रेश पॉइंट ऑफ़ व्यू दिया है!
पर मैं निश्चित रूप से मानता हूँ कि यह खेल कोई सत्य की अग्नि-परीक्षा नहीं है, जैसा कि इसे मार्केट किया जा रहा है. इससे किसी की ज़िन्दगी में कोई वैल्यू एडिशन नहीं होने वाला है. अगर ऐसा होता तो आपकी सत्यमेव जयते वाली बात सही थी .
हमारे जल्दी उकता जाने वाले दिमागों के लिएयह मीडिया मार्केटिंग का, रियलिटी टीवी के सीरीज़ में, एक नया शगूफा है. यह कोशिश है के आपके अंतरतम की भावनाओं को भी कैसे निचोड़ के, उस से कुछ टी.आर.पी निकाल ली जायें.

बालकृष्ण अय्य्रर said...

मामला व्यक्तिगत बातों और परिवार को बेचने का है, मगर क्या करें पूरी दुनिया उत्तर आधुनिकता के मायाजाल मे फंसी है, जो हर चीज को DE CONSTRUCT करके देखना चाहती है. आप घर पर टी.वी. सेट के सामने ज़रूर होते हैं, मगर आपके अपने लोगों की कल्पना मे "आप" के सच के बारे मे विचार आ रहे होते हैं. सब के सच अलग और झुठ कुछ एक ही जैसे...